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गुमसुम

​न गुमसुम था कभी अब से पहले

मैं न जाने क्यूँ तेरा आशिक हुआ हूँ 

है क़ायनात भी हँसती मुझ पर

मैं खुद का ही कातिल हुआ हूँ 
तेरी वफा की ख्वाहिश है मुझको 

और खुद ही खुद में उलझ गया हूँ 

ना हो सकती थी मेरी कभी तू

ये बात अब मैं समझ गया हूँ 
फिर भी तेरी ही कशिश दिल पर छाई है 

तेरी आरज़ू रूह में समाई है

बरसों बीत गए तुम्हें निहारे 

फिर भी तुम्हारी ही यादों में सोता हूँ 

हुई ही नहीं तुम हकीकत मेरी पर

तेरे ही आँसू रोता हूँ 

कोई राह नहीं तेरे आने की

फिर भी तेरा इंतज़ार करता हूँ
छोटा सा दिल है मेरा

इसमें भी छाया अंधेरा

कभी रौशन कर दो इसे तुम 

आ जाओ बन कर सवेरा
यूँ तो हर रात दीवानी लगती है

पर तुम्हारे बिना 

ये सौगात बेगानी लगती है

इस खुशी को कभी मेरा कर जाओ

मुझ में मिट कर कभी 

मुझको अमर कर जाओ
कि शामिल हुआ हूँ तुझमें 

मुझे मंज़िल में मिला देना

तेरे ऊफान का शौक रखता हूँ 

मुझे पत्थर न बना देना
कभी आईना बनो तुम मेरा

कभी मैं बन जाऊँ किनारा तेरा

कुछ इसी तरह सफर में मुझे

अपना बना लेना 
तुम्हारे लिए हम दरिया बनेंगे 

कभी अरमान जगे तो

मुझ में समा जाना

इस दरिया से बड़ा है 

दिल तुम्हारा

कभी अच्छे लगें तो

दिल में बसा लेना